इदि पंचहि पंच हदा सद्दरसफरिसगंधरूवेहिं ।
इक्को कहं ण हम्मदि जो सेवदि पंच पंचेहिं॥1362॥
एक-एक विषय में फँसकर पाँचों जीव गँवाते प्राण ।
जो नर पाँचों विषय सेवते क्यों न गँवाएँ अपने प्राण॥1362॥
अन्वयार्थ : कर्ण इन्द्रिय का विषय बाँसुरी का मधुर शब्द सुनकर हिरण जाल में फँसकर मारा जाता है । दीपक का चमकीला रूप देखने में आसक्त पतंगा दीपक में जल कर नष्ट हो जाता है । स्पर्शन इन्द्रिय का लोलुपी वन में स्वच्छंद विचरण करने वाला हाथी, नकली हथिनी के स्पर्श का इच्छुक बंधन को प्राप्त होता है । जिह्वा इन्द्रिय के विषय में आसक्त मछली धीवर के जाल में फँसकर मर जाती है । गंध का लोभी भ्रमर कमल में मुद्रित/बंद हो जाने से मर जाता है । इस प्रकार पंचेन्द्रिय के शब्द, रस, स्पर्श, रूप, गंध - ऐसे पाँच विषयों के द्वारा पाँचों हने गये हैं, तब फिर एक ही पुरुष पाँचों ही इन्द्रियों के विषयों का सेवन करने वाला कैसे नहीं हना जायेगा?

  सदासुखदासजी