चोरो वि तह सुवेगो सहिलारूवम्मि रत्तदिठ्ठीओ ।
विद्धो सरेण अच्छीसु मदो णिरंय च संपत्तो॥1366॥
चोर सुवेग युवा नारी के रूप देखने का लोभी ।
लगा आँख में बाण, मरण कर गया नरक में वह भोगी॥1366॥
अन्वयार्थ : सुवेग नाम का चोर स्त्रियों के मनोहर रूप देखने में आसक्त होकर नेत्रों में बाणों से विंध कर मर गया और नरक को प्राप्त हुआ ।

  सदासुखदासजी