
रोसाइट्ठो णीलो हदप्पभो अरदिअग्गिसंसत्तो ।
सीदे वि णिवाइज्जदि वेवदि य गहोवसिट्ठो वा॥1368॥
क्रोधी होता नीला, हतप्रभ, अरति-अग्नि में तप्त रहे ।
शीत ऋतु में प्यास लगे अरु भूताविष्ट समान कँपे॥1368॥
अन्वयार्थ : रोष/कोप से व्याप्त पुरुष का शरीर नीला-काला हो जाता है, देह की प्रभा नष्ट हो जाती है और अरति रूपी अग्नि से तप्तायमान हुआ शीत काल में भी गर्म हो जाता है, तृषायुक्त हो जाता है, पिशाच से ग्रस्त व्यक्ति के समान संपूर्ण अंग काँपने लगते हैं ।
सदासुखदासजी