भिउडीतिवलियवयणो उग्गदणिच्चलसुत्तलुक्खक्खो ।
कोवेण रक्खसो वा णरण भीमो णरो भवदि॥1369॥
तीन सलें माथे पर पड़तीं लाल नेत्र बाहर निकलें ।
राक्षस जैसा बने क्रोध से सबके लिए भयानक हो॥1369॥
अन्वयार्थ : कोप से मनुष्य भ्रकुटी चढाकर, त्रिबलि युक्त मुख वाला हो जाता है और विस्तीर्ण-स्तब्ध, लाल-रूक्ष नेत्र हो जाते हैं, मनुष्यों के बीच भयानक राक्षस समान (दुष्ट बन जाता है) हो जाता है ।

  सदासुखदासजी