
जइ कोइ तत्तलोहं गहाय रुठ्ठो परं हणामित्ति ।
पुव्वदरं सो डज्झिदि डहिज्जव ण वा परो पुरिसो॥1370॥
यथा रुष्ट नर परवध हेतु तप्त लौह को ग्रहण करे ।
जले नहीं, या जले अन्य नर लेकिन पहले वही जले॥1370॥
अन्वयार्थ : जिसप्रकार कोई पुरुष क्रोध से कहे कि मैं पर को जलाने के लिये गरम लोहे को ग्रहण करता हँू तो पहले स्वयं ही जल जाता है, अन्य व्यक्ति जले चाहे न जले । पर के पास पहुँचेगा या नहीं पहुँचेगा, परंतु तप्त लोहे को ग्रहण करने वाला पहले स्वयं तो जल ही जाता है ।
सदासुखदासजी