तध रोसेण सयं पुव्वमेव डज्झदि हु कलकले णेव ।
अण्णस्स पुणो दुक्खं करिज्ज रुट्ठो ण य करिज्जा॥1371॥
पिघले हुए लौहवत् पहले स्वयं क्रोध से वह जलता ।
दुःखी करे या नहीं अन्य को वह तो स्वयं दुःखी होता॥1371॥
अन्वयार्थ : तैसे ही क्रोधी तपाये हुए लोहे के समान रोष करके पहले तो अपने को जलाता है, बाद में अन्य को दु:खी करे या न करे ।

  सदासुखदासजी