
णासेदूण कसायं अग्गी णासदि सयं जधा पच्छा ।
णासेदूण तध णरं णिरासवो णस्सदे कोधो॥1372॥
जैसे अग्नि नष्ट करके ईंधन को होती स्वयं विनष्ट ।
वैसे क्रोध मनुज को करता नष्ट स्वयं फिर होता नष्ट॥1372॥
अन्वयार्थ : जैसे अग्नि ईंधन को नाश करके जलाकर, बाद में स्वयं नाश को प्राप्त होती है - शान्त हो जाती है, बुझ जाती है; तैसे ही क्रोध जीव के ज्ञान-दर्शन-सुखादि का नाश करके पश्चात् आत्मा को निगोद में पहुँचाकर स्वयं नष्ट हो जाता है ।
सदासुखदासजी