पं-सदासुखदासजी
कोधो सत्तुगुणकरो णीयाणं अप्पणो य मण्णुकरो ।
परिभव करो सबासे रोसे णासेदि णरमवसं॥1373॥
क्रोध शत्रु-गुण करे स्वयं में बन्धुजनों में शोक करे ।
तिरस्कार हो अपने घर में परवश करके नाश करे॥1373॥
अन्वयार्थ :
क्रोध शत्रुओं का गुणकारक/उपकार करता है
(जब मनुष्य क्रुद्ध होता है,
सदासुखदासजी