
ण गुणे पेच्छदि अववददि गुणे जंपदि अजंपिदव्वं च ।
रोसेण रुद्दहिदओ णारगसीलो णरो होदि ॥1374॥
क्रोधी गुण नहिं देखे, निन्दा करे, अयोग्य कथन करता ।
रौद्र हृदय होकर क्रोधी नर बने नारकी के जैसा॥1374॥
अन्वयार्थ : यह मनुष्य क्रोध के कारण गुणों को नहीं देखता हुआ गुणों का भी अपवाद करता है तथा नहीं बोलने योग्य वचन भी बोलता है । रोष से रौद्रहृदय वाला होकर नारकी जैसे स्वभाव वाला हो जाता है ।
सदासुखदासजी