
जध करिसयस्स धण्णं वरिसेण समज्जिदं खलं पत्तं ।
डहदि फुलिंगों दित्तो तध कोहग्गी समणसारं॥1375॥
यथा कृषक के एक वर्ष का धान्य जलाती चिनगारी ।
तथा श्रमण के जीवन भर का पुण्य जलाती क्रोधाग्नि॥1375॥
अन्वयार्थ : जैसे खेती करने वाले किसान को बडे कष्ट से एक वर्ष पर्यंत इकट्ठा किया गया धान्य खेत में से प्राप्त हुआ, उसे अग्नि का एक फुलिंगा/चिनगारी क्षणमात्र में जला देती है, तैसे ही क्रोधरूपी अग्नि बहुत काल में संचय किये गये साधुपने रूप सार वस्तु को क्षणमात्र में दग्ध कर देती है ।
सदासुखदासजी