जध उग्गविसो उरगो दब्भतणंकुरहदो पकुप्पंतो ।
अचिरेण होदि अविसो तप होदि जदी वि णिस्सारो॥1376॥
यथा उग्र विषधर तिनके से घातक पर ही क्रोध करे ।
वमन करे विष शीघ्र तथा यति रत्नत्रय का नाश करे॥1376॥
अन्वयार्थ : जैसे उग्र विष का धारक सर्प तीक्ष्ण डाभ जाति के तृण से पीडित होवे तो क्रोध से उस डाभ तृण को खा डालता है, किन्तु उससे उसके अन्दर का विष बाहर उबल/ निकल पडता है और इस तरह वह शीघ्र ही नि:सार/निर्विष हो जाता है, शक्ति रहित हो जाता है, तैसे ही क्रोध के कारण साधु भी रत्नत्रयधर्म से रहित नि:सार हो जाता है ।

  सदासुखदासजी