
सुठ्ठु वि पिओ मुहुत्तेण होदि वेसो जणस्स कोधेण ।
पधिदो वि जसो णस्सदि कुद्धस्स अकज्जकरणेण॥1378॥
अति प्रिय नर भी क्रोध करे तो द्वेष पात्र हो क्षण भर में ।
क्रोधी के अनुचित कायाब से यश विनष्ट होता क्षण में॥1378॥
अन्वयार्थ : क्रोध करने से अपना अत्यन्त प्रिय मनुष्य भी एक मुहूर्त में वैर करने योग्य हो जाता है । क्रोधी पुरुष अकार्य कृत्य को करने लगता है । इससे उसका फैला हुआ यश नष्ट हो जाता है ।
सदासुखदासजी