
णीयल्लगो वि कुद्धो कुणदि अणीयल्ल एव सत्तू वा ।
मारेदि तेहिं मारिज्जदि वा मारेदि अप्पाणं॥1379॥
क्रोधी अपने स्वजनों को भी अपना शत्रु बना लेता ।
उन्हें मारता या उनसे मारा जाता खुद मर जाता॥1379॥
अन्वयार्थ : कुपित हुआ मूढ पुरुष अपने पुत्र बंधुजन आदि जो निज हैं उनकी तथा जो अनिज अर्थात् पर हैं, उनको भी शत्रु के समान मार डालता है अथवा शत्रु भाव को प्राप्त दूसरों के द्वारा स्वयं मारा जाता है, तथा क्रोधवश स्वयं ही मर जाता है ।
सदासुखदासजी