
पुज्जो वि णरो अवमाणिज्जदि कोवेण तक्खणे चेव ।
जगविस्सुदं वि णस्सदि माहप्पं कोहवसियस्स॥1380॥
सम्मानित नर भी यदि क्रोध करे तो अपमानित होता ।
जग प्रसिद्ध माहात्म्य त्वरित ही क्रोधी का विनष्ट होता॥1380॥
अन्वयार्थ : पूजनीक मनुष्य भी क्रोध के कारण उसी क्षण में अवज्ञा करने योग्य हो जाता है । जो क्रोध के वशीभूत हैं, उनका जगत विख्यात माहात्म्य भी नाश को प्राप्त हो जाता है ।
सदासुखदासजी