
हिंसं अलियं चोज्जं आचरदि जणस्स रोसदोसेण ।
तो ते सव्वे हिंसालियचोज्जसमुब्भवा दोसा॥1381॥
क्रोध दोष से लोगों की हिंसा करता असत्य बोले ।
चोरी करे अतः हिंसादिक सभी पाप उससे होते॥1381॥
अन्वयार्थ : रोष के दोष से वह क्रुद्ध पुरुष हिंसा करता है, असत्य बोलता है, चोरी करता है । इसलिए क्रोधी के हिंसा, अलीक वचनादि सभी दोष क्रोधी के होते हैं ।
सदासुखदासजी