
कुलरूवाणाबलसुदला - भिस्सरयत्थमदितवादीहिं ।
अप्पाणमुण्णमेतो नीचागोदं कुणदि कम्मं॥1383॥
बल श्रुतरूप लाभ कुल आज्ञा तप एेश्वर्य आदि गुण से ।
अपने को जो बड़ा मानता नीच गोत्र का बन्ध करे॥1383॥
अन्वयार्थ : कुल, रूप, आज्ञा, बल, श्रुतलाभ, ऐश्वर्य, बुद्धि, तपादि के मद से आत्मा को ऊँचा मानने वाला पुरुष नीच गोत्र कर्म को बाँधता है ।
सदासुखदासजी