सव्वे वि कोहदोसा माणकसायस्स होदि णादव्वा ।
माणेण चेव मेथुणहिंसालिय चोज्जमाचरदिं॥1386॥
पूर्व कथित जो दोष क्रोध के वे सब मानी में होते ।
हिंसा झूठ कुशील तथा चोरी में भी वे रत रहते॥1386॥
अन्वयार्थ : पूर्व में कहे जो क्रोध के दोष वे समस्त दोष मानकषाय के धारक के भी होते हैं, ऐसा जानना । अभिमान के कारण ही मैथुन, हिंसा, असत्य, चौर्य इत्यादि पापों को आचरता है अथवा सेवन करता है ।

  सदासुखदासजी