
समणस्स जणस्स पिओ णरो अमाणी सदा हवदि लोए ।
णाणं जसं च अत्थं लभदि सकज्जं च साहेदि॥1387॥
स्वजन और परजन सबको ही निर्मानी प्रिय होते हैं ।
प्राप्त करें यश ज्ञान और धन अन्य कार्य सब सिद्ध करें॥1387॥
अन्वयार्थ : मानरहित विनयवान पुरुष ज्ञान को, यश को और अर्थ को प्राप्त होता है । ज्ञान और यश-कीर्ति का उपार्जन करता है, इसलोक-परलोक में अर्थ उपार्जन करता है और अपने कार्य को साध लेता है ।
सदासुखदासजी