ण य परिहायदि कोई अत्थे मउगत्तणे पउत्तम्मि ।
इह य परत्त य लब्भदि विणएण हु सव्वकल्याणं॥1388॥
धन-हानि नहिं होती कोई फिर किस भय से मान करे ।
इस भव परभव में पाये नर सब कल्याण मार्दव से॥1388॥
अन्वयार्थ : मार्दव अर्थात् कोमलपना, मार्दव धर्म का पालन करने वाले जीव के कुछ नुकसान नहीं होता ।

  सदासुखदासजी