+ अब सात गाथाओं में मायाचार का स्वरूप कहते हैं - -
जध कोडिसमिद्धो वि ससल्लो ण लभदि सरीरणिव्वाणं ।
मायासल्लेण तहा ण णिव्वुदिं तव समिद्धो वि॥1390॥
ज्यों करोड़पति के तन में भी काँटा हो तो नहीं सुखी ।
तथा तपोधन को यदि माया शल्य रहे तो सुखी नहीं॥1390॥
अन्वयार्थ : जैसे करोडों का धनी पुरुष भी यदि शल्य से सहित हो तो भी वह शारीरिक सुख को प्राप्त नहीं होता । तैसे ही माया शल्य सहित पुरुष तप करके भी निर्वाण को प्राप्त नहीं होता ।

  सदासुखदासजी