
होदि य वेस्सो अप्पच्चइदो तध अवमदो य सुजणस्स ।
होदि अचिरेण सत्तू णीयाणदि णिपडिदोसेण॥1391॥
द्वेष-पात्र हो, अपमानित हो, परिजन भी न करें विश्वास ।
बन्धु-बान्धवों का भी शत्रु होता जिसमें माया दोष॥1391॥
अन्वयार्थ : एक मायाचार/कपट रूप दोष के कारण समस्त स्वजनों के द्वेष का पात्र होता है । मायाचार से अपने समस्त स्वजन मित्र भी बैरी हो जाते हैं तथा कपटी, प्रीति करने योग्य नहीं होता, स्वजनों के द्वारा भी अवज्ञा-तिरस्कार करने योग्य हो जाता है और अल्प काल में अपने निज के जो मित्रादि हैं, उनका शत्रु हो जाता है ।
सदासुखदासजी