मायाए मित्तभेदे कदम्मि इधलोगिगच्छपरिहाणी ।
णासदि मायादोसा विसजुददुद्धंव सामण्णं॥1393॥
माया से हो नष्ट मित्रता सब कायाब का होय विनाश ।
ज्यों विष मिश्रित दूध नष्ट हो त्यों मुनित्व का होय विनाश॥1393॥
अन्वयार्थ : मायाचार द्वारा मित्र भेद होने से (मित्रता छूट जाने से) इस लौकिक अर्थ की परिहानि होती है अर्थात् मित्र की सहायता समाप्त होने पर सब कार्य समाप्त हो जाते हैं मायाचार रूप दोष से विषयुक्त दूध के समान, श्रमणपना नष्ट हो जाता है ।

  सदासुखदासजी