
माया करेदि णीचागोदं इच्छी णवुंसयं तिरियं ।
मायादोसेण य भवसएसु डंभिज्जदे बहुसो॥1394॥
माया बाँधे नीच गोत्र, तिर्यंच नपुंसक स्त्री वेद ।
माया से ही भव-भव में नर बारम्बार ठगाते हैं॥1394॥
अन्वयार्थ : मायाचार से नीच गोत्र का बंध होता है । स्त्रीपना, नपुंसकपना, तिर्यंचपना, अनेक भवों तक प्राप्त होता रहता है तथा मायाचार रूप दोष के कारण अनेक बार सैकडों भवों में पर के द्वारा ठगा जाता है ।
सदासुखदासजी