कोहो माणो लोहो य जत्थ मायावि तत्थ सण्णिहिदा ।
कोहमद लोह दोसा सव्वे मायाए ते होंति॥1395॥
जहाँ रहे माया, रहते हैं क्रोध मान अरु लोभ वहाँ ।
क्रोध मान अरु लोभ जन्य सब दोष उदित हों माया में॥1395॥
अन्वयार्थ : जहाँ मायाचार है, वहाँ उसके निकटवर्ती क्रोध, मान, लोभ - ये सभी हैं । क्रोध, अभिमान, लोभ - ये समस्त दोष मायाचारी के प्रगट होते हैं ।

  सदासुखदासजी