
सस्सो य भरधगामस्स सत्तसंवस्छराणि णिस्सेसो ।
दड्ढो डंभणदोसेण कुम्भकारेण रुठ्ठेण॥1396॥
भरत गाँव का धान्य जलाया सात वर्ष तक रुष्ट रहा ।
कुम्भकार ने, क्योंकि रुष्ट था मायाचारी दोषों से॥1396॥
अन्वयार्थ : कुपित हुए कुंभकार ने भरत नाम के ग्राम में समस्त संचित हुए धान्यों को मायाचार से युक्त होकर सात वर्ष पर्यंत दग्ध किया ।
सदासुखदासजी