
लोभेणासाधत्तो पावइ दोसे बहुं कुणदि पावं ।
णीए अप्पणं वा लोभेण णरो ण विग्गणेदि॥1397॥
लोभी नर ‘यह वस्तु मिलेगी’ इस आशा से पाप करे ।
चिन्ता करे न परिजन की, उनको निज-तन को भी दुःख दे॥1397॥
अन्वयार्थ : लोभ से ही साधना चाहता है और लोभ के कारण आने वाला अपना मरण, दु:ख, विपत्ति को भी नहीं गिनता । लोभी को अपना तथा पर - दोनों संबंधी चेत/ ज्ञान नहीं रहता है ।
सदासुखदासजी