लोभो तणेवि जादो जणेदि पावमिदरत्थ किं वच्चं ।
लगिदमउडादिसंगस्स वि हु ण पावं अलोहस्स॥1398॥
तृण की तृष्णा पाप जने तो मूल्यवान का क्या कहना ।
निर्लाेभी के तन पर परिग्रह होवे किन्तु न पाप बँधे॥1398॥
अन्वयार्थ : यदि तिनके में भी लोभ किया जाये तो वह पाप को उत्पन्न करता है तो फिर अन्य वस्तुओं में किया गया लोभ पाप को उत्पन्न करता है, उसमें क्या संशय? किन्तु जो व्यक्ति निर्लोभी है, वह मुकुट-कुंडलादि आभूषण धारण किये हुए भी है तो भी पाप बंध नहीं होता । लोभी के समता-संतोष नहीं होता है । लोभ तो शरीर, धन, धान्यादि में अहंकारमम कार बुद्धि है और जिसे परवस्तु में मूर्च्छा - ममता-बुद्धि नहीं है, उसके पापबंध भी नहीं है ।

  सदासुखदासजी