
तेलोक्केण वि चितस्स णिव्वुदी णत्थि लोभघत्थस्स ।
संतुट्ठो हु अलोभो लभदि दरिद्दो वि णिव्वाणं॥1400॥
तीन लोक का वैभव हो, पर लोभी चित में नहिं सन्तोष ।
निर्लाेभी यदि हो दरिद्र तो भी पाता है शिव-सुख कोष॥1400॥
अन्वयार्थ : लोभ से जिसका चित्त व्याप्त है, उसे तीन लोक का राज्य भी मिल जाये तो भी तृप्त नहीं होता - सुखी नहीं होता और लोभरहित - संतुष्ट पुरुष दरिद्री है, धन रहित है, तो भी निर्वाण के सुख को प्राप्त होता है ।
सदासुखदासजी