
ण हि ते कुणिज्ज सत्तू अग्गी बग्घी व किण्हसप्पो वा ।
जं कुणइ महादोसं णिव्वुदिविग्घं कसायरिवू॥1403॥
शत्रु अग्नि अरु व्याघ्र सर्प भी नहिं करते हैं वैसे दोष ।
जैसे करे कषाय शत्रु शिव-पथ में विघ्न करे महदोष॥1403॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार कषाय रूपी बैरी निर्वाण में विघ्न रूप महादोष करता है । ऐसा महा दोष बैरी नहीं करता । अग्नि, व्याघ्र और काला नाग भी नहीं करता । बैरी एक जन्म मैं दु:ख देता है, अग्नि एक बार जलाती है, व्याघ्र एक बार भक्षण करता है, कृष्ण सर्प एक बार ही डसता है; लेकिन कषायें अनंत जन्मोें में दु:ख देने वाली हैं ।
सदासुखदासजी