इंदियकसाय दुद्दंतस्सा णिव्वेदखलिणिदा संता ।
ज्झणकसाए भीदा ण दोसविसमेसु पाडेंति॥1405॥
विषय-कषाय अश्व को करे नियन्त्रित जब वैराग्य ललाम ।
चाबुक ध्यान करे भयभीत, न पावे नर तब पाप-स्थान॥1405॥
अन्वयार्थ : किन्तु जिनको दृढ वैराग्य रूपी लगाम से नियंत्रित कर लिया है और जो सद् ध्यानरूपी चाबुक द्वारा वश में कर लिये गये हैं । ऐसे कषाय और इन्द्रिय रूपी घोडे दोष रूपी दुर्गम स्थानों में नहीं पटकते ।

  सदासुखदासजी