
इंदियकसाय पण्णगदठ्ठा बहुवेदणुद्दिदा पुरिसा ।
पब्भाट्टझाणसुक्खा संजमजीवं पविजहंति॥1406॥
विषय-कषाय सर्प से डसे मनुज बहु दुख से पीड़ित हों ।
उत्तम ध्यानानन्द से वंचित संयम जीवन को त्यागे॥1406॥
अन्वयार्थ : जो पुरुष कषाय और इन्द्रिय रूपी सर्प के द्वारा काटे जाने से अति वेदना से युक्त हैं, भ्रष्ट हैं, वे ध्यान रूप सुख से रहित हुए तत्काल ही चारित्र रूपी/संयमरूप जीव का त्याग कर देते हैं - छोड देते हैं ।
सदासुखदासजी