
ज्झाणागदेहिं इंदियकसाय भुजगा विरागभंतेहिं ।
णियमिज्जंता संजमजीवं साहुस्स ण हरंति॥1407॥
ध्यान सिद्ध औषधि, एवं वैराग्य मन्त्र से वश होते ।
विषय-कषाय भुजंग, साधु का संयम जीवन नहिं हरते॥1407॥
अन्वयार्थ : इन्द्रिय कषाय रूप सर्प को सद्ध्यान रूप वैद्य ने वैराग्यरूपी मंत्र से विष रहित कर दिया है । वे सर्प साधु के संयमरूपी जीवन का हरण नहीं कर सकते, घात नहीं कर सकते ।
सदासुखदासजी