
तिंेविंध
पुरिसमयं॥1408॥
भोग-स्मरण पाँख, चिन्तन है वेग, विषय-विष रति धारा ।
इन्द्रियरूपी बाण मन-धनुष पर रखकर छोड़ा जाता॥1408॥
अन्वयार्थ : संसार में इन्द्रियरूप बाण, पुरुषरूप मृग का घात करते हैं । बाण के पंख होते हैं । इन्द्रियरूप बाण के विषयों का स्मरण करना ही पंख है और चिंतारूप वेग को धारण किये हुए हैं तथा विषयरूप विष से लिप्त हैं । जिनके रति/आसक्ति वही धार है और मनरूपी धनुष से छूटते हैं । ऐसे इन्द्रियरूप बाण जीवरूप मृग का घात करते हैं ।
सदासुखदासजी