
गंथाडवीचरंतं कसायविसकंटया पमायमुहा ।
विंद्धंति विसयतिक्खा अधिदिदढोवाणहं पुरिसं॥1410॥
परिग्रह वन में बिखरे विषमय कण्टक बहुत प्रमाद मुखी ।
धैर्य-पादुका बिना विचरता उसको चुभकर करें दुखी॥1410॥
अन्वयार्थ : परिग्रहरूपी गहन वन में कषायरूप विष के काँटे बिखरे हुए हैं । कैसे हैं विषयरूप विष के काँटे? प्रमादरूप जिनके मुख हैं और विषयोंं की चाह रूप उनकी तीक्ष्ण अणी/नोंक है । ऐसे विषयरूप कंटकों से भरे परिग्रहरूप वन में धैर्यरूप जूतों रहित जो पुरुष प्रवेश करते हैं, वे कषायरूप विषकंटकों द्वारा विंधे हुए मरण कर दुर्गति को प्राप्त होते हैं ।
सदासुखदासजी