आवद्धधिदिदढोवाणहस्स उवओगदिट्ठिजुत्तस्स ।
ण करिंति किंचि दुक्खं कसाय विसकंटया मुणिणो॥1411॥
जिसने धैर्य-पादुका पहनी सम्यग्ज्ञान दृष्टि सम्पन्न ।
उसको विषय-कषायमयी काँटे किंचित् दे सकें न कष्ट॥1411॥
अन्वयार्थ : जिसने धैर्यरूपी पगरखी/पादत्राण पहन रखे हैं और उपयोग की शुद्धता रूप दृष्टि से जो संयुक्त हैं, ऐसे मुनि को कषायरूपी विष के काँटे किंचित् मात्र भी दु:ख नहीं दे सकते - चुभते नहीं हैं ।

  सदासुखदासजी