
उड्डहणा अदिचवला अणिग्गहिदकसायमक्कडा पावा ।
गंथफल लोलहिदया णासंति हु संजमारामं॥1412॥
कपि-कषाय उद्दण्ड, चपल, पापी, परिग्रह-फल में आसक्त ।
नहीं किया इनका निग्रह तो करते संयम उपवन नाश॥1412॥
अन्वयार्थ : जो पुरुष असंयमी हैं, अति चपल जिनका मन है, पापरूप जिनकी प्रवृत्ति है, जिनने कषायरूपी बन्दर का निग्रह नहीं किया है और परिग्रह रूप फल में जिनका मन लोलुपी है, वे पुरुष संयमरूप बाग/उद्यान का विध्वंस करते हैं, उन्हें अनंतकाल तक संयम दुर्लभ हो जाता है ।
सदासुखदासजी