
णिच्चं पि अमज्झत्थे तिकालदोसाणुसरणपरिहत्थे ।
संजमरज्जूहिं जदी बंधंति कसायमक्कडए॥1413॥
कपि-कषाय है चपल निरन्तर दोष ग्रहण में चतुर महान ।
इन्हें संयमी संयमरूपी रस्सी से ले लेता बाँध॥1413॥
अन्वयार्थ : जो यति हैं, वे संयमरूपी रस्सी से कषायरूपी बन्दर को बाँध देते हैं । कैसे हैं कषायरूपी बन्दर? मध्यस्थ/शांत नहीं हैं, निरन्तर चपल हैं । और कैसे हैं कषायरूपी बन्दर? भूत, भविष्यत् और वर्तमान काल में दोषों को प्राप्त कराने में प्रवीण हैं । ऐसे कषायरूपी बन्दरों को दिगम्बर यति ही संयम रूपी रस्सी से बाँधने में समर्थ हैं, अन्य नहीं ।
सदासुखदासजी