धिदिवम्मिएहिं उवसमसरेहिं साधूहिं णाणसत्थेहिं ।
इंदियकसायसत्तू सक्का जुत्तेहिं जेदुं जे॥1414॥
सन्तोष कवच उपशमरूपी शर और ज्ञानमय शस्त्रों से ।
सहित साधु गण इन्द्रिय और कषाय शत्रुओं को जीतें॥1414॥
अन्वयार्थ : धैर्यरूप बख्तर/कवच, उपशमभावरूप बाण और ज्ञानरूप शस्त्रों से युक्त जो साधु हैं, वे इन्द्रियकषाय रूपी शत्रु को जीतने में समर्थ होते हैं ।

  सदासुखदासजी