इंदियकसायचोरा सुभावणासंकलाहिं वज्झंति ।
ता ते ण विकुव्वंति चोरा जह संकलाबद्धा॥1415॥
इन्द्रिय और कषाय चोर शुभ ध्यान भाव की साँकल से ।
बाँधे जाने पर वे चोर समान हानि नहिं कर सकते॥1415॥
अन्वयार्थ : इन्द्रिय और कषायरूप चोर को सुन्दर भावनारूप साँकल से बाँधने पर वे विकार नहीं कर सकते । जैसे दृढ साँकल द्वारा बाँधे जाने पर चोर विकार या दोष उत्पन्न नहीं कर सकते ।

  सदासुखदासजी