इंदियकसाय बग्घा संजमणरघादणे अदिपसत्ता ।
वेरग्गलोहदढपंजरेहिं सक्का हु णियमेदुं॥1416॥
इन्द्रिय और कषाय व्याघ्र संयम-नर भक्षण के प्रेमी ।
इनको रोक सके मजबूत लौह वैराग्य पींजरे में॥1416॥
अन्वयार्थ : इन्द्रिय-कषाय रूप व्याघ्र वैराग्यरूप पींजरों के बिना रोके नहीं जा सकते । इंदियकसायहत्थी वयवारिमदीणिदा उवायेण ।

  सदासुखदासजी