पं-सदासुखदासजी
जदि विसयगंधहत्थी अदिणिज्जदि रागदोसमयमत्ता ।
चिट्ठिदुणज्झाणजोहस्स वसे णाणंकुसेण विणा॥1420॥
ज्ञानांकुश के बिना राग मद-मस्त विषयगंध हस्ती ।
परिग्रह वन में जाये तो वह ज्ञान-ध्यान वश रहे नहीं॥1420॥
सदासुखदासजी