
विसयवणरमणलोला बाला इंदियकसायहत्थी ते ।
पसमे रमेदव्वा तो ते दोसं ण काहिंति॥1421॥
विषय-विपिन में क्रीड़ा प्रेमी विषय-कषाय बाल हस्ती ।
प्रशम विपिन में उन्हें रमायें दोष करें नहिं किंचित् भी॥1421॥
अन्वयार्थ : जो मन रूपी गंधहस्ती स्वयमेव परिग्रह रूप वन में प्रवेश करता है, रागद्वे षरूप मद से उन्मत्त हो रहा है, उसे ज्ञानरूप अंकुश बिना और ध्यानरूपी योद्धा के वशीभूत हुए बिना नहीं रहते अर्थात् विषयरूपी वन में चले जाते हैं, इसलिए इन विषयरूपी वनों में रमण करने के लोलुपी, ऐसे इन्द्रिय कषाय रूप बाल हाथी उन्हें प्रशमभाव/वीतराग भाव में रमाने योग्य हैं ।
सदासुखदासजी