सद्दे रूवे गंधे रसे य फासे सुभेय असुभे य ।
तम्हा रागद्दोसं परिहर तं इंदियजएण॥1422॥
अतः क्षपक! इन्द्रिय को जीतो राग-द्वेष मत करो कभी ।
शब्द रूप रस गन्ध स्पर्श अशुभ में अथवा शुभ में भी॥1422॥
अन्वयार्थ : इसलिए भो मुने! इन्द्रियों पर विजय करके शुभ और अशुभ जो शब्द, रूप, गन्ध रस और स्पर्श - इनमें राग-द्वेष का त्याग करना ।

  सदासुखदासजी