
जह णीरसं पि कडुयं ओसहं जीविदत्थिओ पिबदि ।
कडुयं पि इंदियजयं णिव्वुइहेदुं तह भजेज्ज॥1423॥
जैसे नीरस कटु औषधि भी जीवन-अभिलाषी पीता ।
अतः मुक्ति अभिलाषी तू भी कटु इन्द्रिय-जय सेवन कर॥1423॥
अन्वयार्थ : जैसे जीने के लिए अर्थात् निरोगी होने के लिये रोगी, नीरस और कडवी औषधि भी पी लेता है, तैसे ही अनन्त जन्म-मरण का अभाव करने के लिये ज्ञानी, इन्द्रियों पर विजय करना अत्यंत कठिन होने पर भी निर्वाण के लिये अंगीकार करते हैं । यद्यपि संसारी मोही जीवों को विषयों का त्याग करना अति विषम, कठिन है; तथापि ज्ञानी उन्हें क्षणमात्र में त्याग देते हैं ।
सदासुखदासजी