
सव्वे वि य ते भुत्ता चत्ता वि य तह आणंतखुत्तो मे ।
सव्वेसु एत्थ को मज्झ विंभओ भुत्तविजडेसु॥1425॥
मैंने सब पुद्गल को भोगा, छोड़ा बार अनन्त अरे!
इन भोगे-त्यागे विषयों में कैसा हो आश्चर्य अरे॥1425॥
अन्वयार्थ : सर्व प्रकार के पुद्गल द्रव्य अनंतबार आहार, शरीर, इन्द्रियरूप परिणमन कर करके भोग लिये गये हैं और अनंतबार छोड दिये हैं । ऐसे सभी पुद्गलों के ग्रहण-त्याग में क्या विस्मय/आश्चर्य है?
सदासुखदासजी