रूवं शुभं च असुभं किंचि वि दुक्खं सुहं च ण य कुणदि ।
संकप्पविसेसेण हु सुहं च दुखं च होइ जए॥1426॥
अच्छा बुरा न होता कोई नहिं कोई सुख या दुख दे ।
जो भी सुख-दुख होता जग में वह अपने संकल्पों से॥1426॥
अन्वयार्थ : शुभ रूप (वर्ण) जीव को किंचित् भी सुख-दु:ख नहीं देते । रूप को देख संकल्प विशेष करने से जगत में सुख-दु:ख होता है ।

  सदासुखदासजी