
एवं सम्मं सद्दरसगंधफासे विचारयित्ताणं ।
सेसाणि इंदियाणि वि णिज्जेदव्वाणि बुद्धिमदा॥1428॥
इसी तरह स्पर्श गन्ध रस शब्द विषय में जो वर्ते ।
शेष इन्द्रियों को भी निज पौरुष से बुद्धिमान जीतें॥1428॥
अन्वयार्थ : ऐसे इन्द्रियों के विषयों को इस लोक - परलोक में दोषकारी विचारकर - जानकर और शब्द, रस, गन्ध, स्पर्श जिनके विषय हैं; उन शेष कर्ण, रसना, नासिका, स्पर्शन इन्द्रियों को भी बुद्धिमानों को जीतना योग्य है ।
सदासुखदासजी