
जदिदा सवति असंतेण परो तं णत्थि मेत्ति खमिदव्वं ।
अणुकम्पा वा कु ज्जा पावइ पावं वरावेत्ति॥1429॥
कोई झूठा दोष कहे तो, मुझमें नहीं, अतः समनीय ।
अनुकम्पा करने लायक वह क्योंकि पाप बँधा निश्चित॥1429॥
अन्वयार्थ : जो दोष मुझमें नहीं हैं और कोई दोष लगाता है - कहता है तो ऐसा विचार करना कि जिसमें ये दोष हैं, उन्हें कहते हैं, मुझमें तो ऐसा दोष नहीं है । ऐसा विचार कर क्षमा करना अथवा इसका दोष मुझे नहीं लगता या हमारे यथार्थ दोषों को कहता है तो मेरा इसमें क्या नुकसान है? अथवा ऐसा विचार कर करुणा करना कि मेरे निमित्त से यह गरीब पाप को प्राप्त होगा । इसको मोहनीय कर्म तथा ज्ञानावरण कर्म ने दबा रखा/तीव्र उदय है, इससे कषायों से प्रेरित हुआ बकवाद करके स्वयं को नरक-निगोद में पटकता है । इस प्रकार करुणा ही करता है ।
सदासुखदासजी