
जदि वा सवेज्ज संतेण परो तह वि पुरिसेण खमिदव्वं ।
सो अत्थि मज्झ दोसो ण अलीयं तेण भणिदत्ति॥1430॥
यदि कोई सत् दोष कहे तो भी तुम उसे क्षमा करना ।
क्योंकि दोष है मुझमें अतः न उसने कोई झूठ कहा॥1430॥
अन्वयार्थ : जो दोष अपने में हों और उन दोषों को कोई अन्य व्यक्ति प्रगट करता/कहता है तो उसे भी क्षमा करना कि आपने जो हमारे दोष कहे, वे सत्य ही हैं, मेरे में वे दोष हैं । इसने झूठे नहीं कहे हैं, अब यदि मुझे ये दोष बुरे लगते हैं तो मुझे शीघ्र ही इन दोषों का त्याग करना है । जिस दोष से मेरा अपवाद हो, वह दोष मुझे ग्रहण करना उचित नहीं ।
सदासुखदासजी