सत्तो वि ण चेव हदो हदो वि ण य मारिदोत्ति य खमेज्ज ।
मारिज्जंतो विसहेज्ज चेव धम्मो ण णठ्ठोत्ति॥1431॥
इसने खोटे शब्द कहे, पर मारा नहिं, यह गुण सोचो ।
मारा भी तो प्राण लिये नहिं प्राण लिये पर धर्म नहीं॥1431॥
अन्वयार्थ : यदि कोई मुझे गाली देता है तो ऐसा विचार करना कि यह मुझे गाली ही तो देता है, मारता तो नहीं है! और यदि मारे तो ऐसा सोचना कि यह मार ही तो रहा है, प्राणों का घात तो नहीं किया! जगत में मार डालने वाले भी तो होते हैं । और यदि प्राण घात करता है तो यह चिंतवन करना कि इसने मेरा धर्म तो हरण नहीं किया, प्राण तो विनाशीक ही हैं, दूसरे निमित्त से नाश होते ही, इसका इसमें कुछ अपराध नहीं । ऐसा चिंतवन करके क्षमा करना ।

  सदासुखदासजी